कीमो नहीं करवाया 8 महीने बाद स्टेज 4 लेकर लौटी

लेखक: Dr. Harshvardhan Atreya

यह लेख सिर्फ जानकारी के लिए है और किसी मेडिकल सलाह की जगह नहीं ले सकता। कैंसर के इलाज से जुड़ा कोई भी फैसला हमेशा किसी योग्य ऑन्कोलॉजिस्ट से सलाह करके ही लें।

डेढ़ साल पहले की बात है। मेरी OPD में एक महिला आईं — उन्नाव से। साथ में उनकी बेटी थी।

मार्च 2024 में उनकी छाती में एक गांठ महसूस हुई थी। बायोप्सी हुई। रिपोर्ट में निकला — HER2 पॉज़िटिव ब्रेस्ट कैंसर, स्टेज 2। सर्जरी हो सकती थी। कीमो के बाद पूरा इलाज संभव था।

लेकिन उन्होंने कीमो नहीं करवाया।

क्यों? क्योंकि उनके व्हाट्सएप पर एक मैसेज आया था — “कीमो ज़हर है। यह कैंसर की कोशिकाओं के साथ शरीर की अच्छी कोशिकाओं को भी मार देती है। आयुर्वेद में कैंसर का इलाज है। गुजरात में एक क्लिनिक है, वहां जाओ।”

वो वहां गईं। तीन लाख रुपये खर्च किए। आठ महीने बाद वापस आईं — स्टेज 4 लेकर। कैंसर उनके लिवर और हड्डियों तक फैल चुका था।

यह लेख उस मैसेज भेजने वाले के लिए नहीं है। यह लेख आपके लिए है — क्योंकि वही मैसेज आज भी घूम रहा है। आइए, उसमें छिपे पांच झूठे दावों को एक-एक करके समझते हैं।

पांच दावे जो हर बार दोहराए जाते हैं

यह कोई इक्का-दुक्का अफवाह नहीं है। यह एक पूरा सिस्टम है, एक बिज़नेस मॉडल है, और यह जानलेवा है। पांच दावे कुछ इस तरह फैलाए जाते हैं:

  1. कीमो ज़हर है — यह कैंसर के साथ-साथ शरीर की अच्छी कोशिकाओं को भी मार देती है।
  2. आयुर्वेद और प्राकृतिक इलाज से कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकता है।
  3. फेनबेंडाज़ोल और आइवरमेक्टिन जैसी कीड़े मारने की दवाइयां कैंसर ठीक करती हैं।
  4. डॉक्टर दवा कंपनियों के लिए कीमो बेचते हैं और इसके बदले कमीशन लेते हैं।
  5. कीमो से कोई फायदा नहीं होता, मरीज़ आखिर में मर ही जाता है, तो इतनी तकलीफ क्यों दी जाए।

पांच दावे, पांच झूठ — और इनके पीछे एक ऐसी महिला की ज़िंदगी है, जो बच सकती थी।

आखिर एक पढ़ी-लिखी महिला ने ये बात क्यों मान ली?

साफ बात है — यह महिला मूर्ख नहीं थीं। वो पढ़ी-लिखी थीं, उनकी बेटी बैंक में नौकरी करती थी। फिर भी उन्होंने वो मैसेज सच मान लिया। क्यों?

क्योंकि उस मैसेज ने उनके अंदर के डर को निशाना बनाया।

पहला डर — साइड इफेक्ट्स का डर। बाल झड़ना, उल्टी, कमज़ोरी — यह सब सच है, कीमो के साइड इफेक्ट्स होते ही हैं। लेकिन ऐसे मैसेज आधा सच बताते हैं और पूरा सच छुपा लेते हैं।

दूसरा डर — पैसों का डर। “कीमो में 5-10 लाख लग जाएंगे, हम बर्बाद हो जाएंगे” — और तभी कोई कहता है, “यह आयुर्वेदिक क्लिनिक सिर्फ 3 लाख में ठीक कर देगा।”

तीसरा डर — समाज का दबाव। रिश्तेदार कहते हैं, “बेचारी को इतनी तकलीफ क्यों दे रहे हो, कोई नेचुरल तरीका आज़माओ” — और परिवार इमोशनल दबाव में फंस जाता है।

चौथा डर — डॉक्टर पर से भरोसा उठना। “डॉक्टर तो पैसों के लिए सब करते हैं, वो सच नहीं बताएंगे” — और तभी वह व्हाट्सएप मैसेज डॉक्टर से भी ज़्यादा भरोसेमंद लगने लगता है।

यही चार डर — साइड इफेक्ट्स, पैसा, समाज का दबाव, और भरोसे का टूटना — मिलकर एक ऐसा तूफान बनाते हैं जिसमें परिवार आसानी से फंस जाता है।

अब हर दावे को बारी-बारी परखते हैं

दावा 1: “कीमो ज़हर है, अच्छी कोशिकाओं को भी मार देती है”

यह आधा सच है। कीमोथेरेपी उन कोशिकाओं पर असर करती है जो तेज़ी से बंटती हैं, और कैंसर की कोशिकाएं सबसे तेज़ बंटती हैं। इस वजह से बाल, बोन मैरो और आंतों की कुछ अच्छी कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं — यही साइड इफेक्ट्स की वजह है।

लेकिन जो बात कोई व्हाट्सएप मैसेज नहीं बताता, वह यह है — आज की कीमोथेरेपी में डोज़ और समय इस तरह तय किया जाता है कि कैंसर की कोशिकाएं मरें और अच्छी कोशिकाओं को दोबारा बनने का समय मिले। यह 1980 के दशक की कीमो नहीं है। आज हमारे पास ऐसी सपोर्टिव दवाइयां हैं जो साइड इफेक्ट्स को काफी हद तक कम कर देती हैं। साइड इफेक्ट्स होते हैं, लेकिन उन्हें संभाला जा सकता है।

एक बात और — जो लोग “कीमो ज़हर है” कहते हैं, वही आपको आयुर्वेदिक “दवा” बेचते हैं जिसमें कई बार आर्सेनिक, लेड या मरकरी जैसी भारी धातुएं मिली होती हैं। यह भी ज़हर ही है — बस इसमें कैंसर मारने की कोई क्षमता नहीं होती।

Illustration showing a chemotherapy IV bag alongside cancer cells and healthy cells, explaining the myth that chemotherapy is poison and highlighting the difference between cancer cells and healthy cells


दावा 2: “आयुर्वेद और नेचुरल इलाज से कैंसर ठीक हो सकता है”

डेटा क्या कहता है, यह देखना ज़रूरी है। अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट की एक पुरानी स्टडी बताती है कि जिन मरीज़ों ने मानक इलाज छोड़कर सिर्फ वैकल्पिक इलाज लिया, उनमें मृत्यु दर काफी ज़्यादा पाई गई। हाल ही की एक स्टडी में मानक इलाज से पांच साल तक जीवित रहने की दर करीब 85% पाई गई, जबकि सिर्फ वैकल्पिक इलाज लेने वालों में यह दर बहुत कम रही।

आयुर्वेद में कुछ चीज़ें ज़रूर मददगार हो सकती हैं — जैसे साइड इफेक्ट्स कम करना, खान-पान में सुधार, दर्द को संभालना। लेकिन कैंसर का मुख्य इलाज? इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। अगर कोई दावा करे कि “हमारे यहां हज़ारों मरीज़ ठीक हुए हैं”, तो एक सीधा सवाल पूछिए — “डेटा कहां है? किस जर्नल में छपा है?” ज़्यादातर मामलों में जवाब नहीं मिलेगा।

Illustration showing Ayurvedic herbs and a mortar and pestle with the Hindi text "दावा नंबर 2: आयुर्वेद और प्राकृतिक इलाज से कैंसर ठीक हो सकता है!" discussing the myth that Ayurveda and natural remedies can cure cancer.


दावा 3: “फेनबेंडाज़ोल और आइवरमेक्टिन कैंसर ठीक करते हैं”

यह आजकल सबसे ज़्यादा फैलाया जाने वाला और सबसे खतरनाक दावा है। कैंसर के डॉक्टरों की एक बड़ी अमेरिकी संस्था ने हाल ही में साफ कहा कि आइवरमेक्टिन और फेनबेंडाज़ोल का इस्तेमाल कैंसर के इलाज के लिए, अकेले या पारंपरिक इलाज के साथ, नहीं किया जाना चाहिए। अमेरिकन कैंसर सोसाइटी ने भी कहा है कि फेनबेंडाज़ोल का इंसानों पर कैंसर के इलाज के लिए कोई परीक्षण ही नहीं हुआ है — यह जानवरों के पेट के कीड़े मारने की दवा है।

फिर भी सोशल मीडिया पर इसे चमत्कारी इलाज बताया जा रहा है, क्योंकि लैब की एक पेट्री डिश में इसका कुछ असर देखा गया था। लेकिन याद रखिए — पेट्री डिश में तो ब्लीच भी कैंसर की कोशिकाओं को मार देता है। क्या इसका मतलब है कि हमें ब्लीच पीना चाहिए? बिल्कुल नहीं।

Hindi infographic explaining that Fenbendazole and Ivermectin are anti-parasitic medicines and are not proven to cure cancer, with medicine bottles, parasite icons, and a cancer cell illustration


दावा 4: “डॉक्टर दवा कंपनियों के लिए कीमो बेचते हैं”

साफ बात है — एक डॉक्टर के तौर पर मैं, Dr. Harshvardhan Atreya, यह कह सकता हूं कि डॉक्टरों को कीमो लिखने के बदले किसी दवा कंपनी से कोई कमीशन नहीं मिलता, चाहे वो किसी भी बड़े अस्पताल में हों। डॉक्टर स्थापित मेडिकल गाइडलाइंस के हिसाब से इलाज करते हैं, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं और कोई भी इन्हें पढ़ सकता है।

सबसे बड़ा सबूत यह है कि सरकारी अस्पतालों में भी वही कीमो प्रोटोकॉल इस्तेमाल होता है, जहां दवा कंपनियों का कोई प्रभाव नहीं होता। अगर कीमो सिर्फ मुनाफे का खेल होता, तो सरकारी अस्पतालों में अलग इलाज होता — पर ऐसा नहीं है।

Hindi infographic illustrating the claim that doctors prescribe chemotherapy for pharmaceutical commissions, featuring a doctor consultation, chemotherapy medicine vials, pharma representatives, and money bundles in a 16:9 layout.


दावा 5: “कीमो से कोई फायदा नहीं, मरीज़ आखिर में मर ही जाता है”

कीमोथेरेपी से कोई फायदा नहीं होता” कहना एक भ्रामक धारणा है। कुछ प्रकार के कैंसर, विशेषकर बहुत उन्नत (अंतिम) अवस्था में, उपचार के परिणाम सीमित हो सकते हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि कीमोथेरेपी प्रभावी नहीं होती। कई प्रकार के कैंसर में यह उपचार ट्यूमर का आकार कम करने, बीमारी की प्रगति को धीमा करने, कैंसर के दोबारा होने के जोखिम को कम करने और मरीज की जीवन अवधि के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

  • खून के एक खास कैंसर (एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकीमिया) में 1960 के दशक में बचने की दर सिर्फ 10% थी, आज यह 90% से ज़्यादा है।
  • टेस्टिकुलर कैंसर के एक प्रकार में कीमो से 95% से ज़्यादा मरीज़ पूरी तरह ठीक हो जाते हैं।
  • हॉजकिन लिम्फोमा में कीमो से 85-90% मरीज़ ठीक हो जाते हैं।
  • HER2 पॉज़िटिव ब्रेस्ट कैंसर में, अगर यह शुरुआती स्टेज में हो, तो कीमो और टारगेटेड थेरेपी से 90% से ज़्यादा मरीज़ लंबे समय तक जीवित रहते हैं।

यह वो आंकड़े हैं जो कभी किसी व्हाट्सएप फॉरवर्ड में नहीं आते।

showing a chemotherapy patient in a hospital bed with bold text about false cancer treatment claims and chemotherapy myths, highlighting cancer scams and misinformation


[नोट: इस लेख में दी गई सभी स्टडीज़, संस्थाओं और आंकड़ों (NCI, JAMA, ASCO, अमेरिकन कैंसर सोसाइटी आदि) को पब्लिश करने से पहले असली सोर्स लिंक के साथ दोबारा वेरीफाई और रेफरेंस ज़रूर करें।]

आखिर यह झूठ इतना क्यों फैलता है?

अगर यह सब झूठ है, तो यह इतनी तेज़ी से क्यों फैलता है? जवाब सीधा है — यह एक बिज़नेस है।

जो इंस्टाग्राम पेज “कीमो ज़हर है” कहता है, उसकी प्रोफाइल में क्या मिलता है? किसी क्लिनिक का लिंक, किसी आयुर्वेदिक सेंटर का नंबर, या किसी “कैंसर रिवर्सल प्रोग्राम” की फीस, जो अक्सर दो-तीन लाख रुपये होती है।

यह पूरा मॉडल तीन आसान कदमों में चलता है — पहले कीमो का डर फैलाओ, फिर डॉक्टर पर से भरोसा तोड़ो, और फिर अपना “नेचुरल इलाज” बेचो। जब मरीज़ स्टेज 4 लेकर वापस आता है, तब यही लोग कहते हैं — “आपने देर कर दी, पहले आते तो ठीक हो जाते।”

यह खेल हर महीने हज़ारों परिवारों के साथ, हर शहर में, हर राज्य में खेला जा रहा है।

सही रास्ता क्या है

अगर आप या आपके परिवार में किसी को कैंसर का पता चला है, तो यह रास्ता अपनाएं:

  1. बायोप्सी ज़रूर करवाएं। बिना बायोप्सी के इलाज अंधेरे में तीर चलाने जैसा है।
  2. मॉलिक्यूलर टेस्ट करवाएं। यह कैंसर की पूरी पहचान बताता है।
  3. मान्य मेडिकल गाइडलाइंस के हिसाब से इलाज लें।
  4. इलाज बीच में न रोकें। तीसरी साइकिल के बाद घबराएं नहीं, डॉक्टर से सही योजना बनाएं।
  5. दूसरी राय ज़रूर लें, लेकिन किसी योग्य ऑन्कोलॉजिस्ट से — किसी व्हाट्सएप ग्रुप से नहीं।

अब वापस उस महिला की बात। वो स्टेज 4 लेकर लौटीं — कैंसर लिवर तक फैल चुका था। लेकिन हमने हार नहीं मानी। चूंकि उनका कैंसर HER2 पॉज़िटिव था, टारगेटेड थेरेपी का विकल्प मौजूद था। आज वो इलाज पर हैं, असर दिख रहा है। लेकिन जो आठ महीने उन्होंने खोए, वो कभी वापस नहीं आएंगे।

यह लेख उनके लिए नहीं है। यह उस अगली महिला के लिए है, जिसके व्हाट्सएप पर कल सुबह वही मैसेज आने वाला है।

एक छोटी चेकलिस्ट, जो सेव कर लें

अगली बार जब कोई कहे “कीमो ज़हर है”, तो यह सवाल ज़रूर पूछें:

  • क्या यह दावा किसी डेटा या रिसर्च पर आधारित है, या सिर्फ डर पर?
  • जो “इलाज” बताया जा रहा है, क्या वह किसी मान्य जर्नल में प्रकाशित हुआ है?
  • जो क्लिनिक बता रहा है, क्या वह रजिस्टर्ड है? क्या वहां कोई असली ऑन्कोलॉजिस्ट मौजूद है?
  • क्या यह वही मैसेज है जो पिछले साल भी वायरल हुआ था, बस नई पैकेजिंग में?

कीमो के साइड इफेक्ट्स सच हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जो लोग “कीमो ज़हर है” कहकर आपको डराते हैं, उनका बेचा हुआ इलाज सिर्फ ज़हर नहीं — वो जानलेवा भी हो सकता है।

अगर आपके परिवार में किसी को अभी कोई फैसला लेना है, तो यह लेख उन्हें ज़रूर भेजें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. क्या कीमोथेरेपी सच में शरीर की अच्छी कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है?
हां, कुछ हद तक। कीमो उन कोशिकाओं पर असर करती है जो तेज़ी से बंटती हैं, इसलिए बाल, बोन मैरो और आंतों जैसी कुछ अच्छी कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं। लेकिन आज की कीमोथेरेपी में डोज़ और सपोर्टिव दवाइयों की मदद से इन साइड इफेक्ट्स को काफी हद तक संभाला जा सकता है।

2. क्या आयुर्वेद से कैंसर का इलाज संभव है?
आयुर्वेद साइड इफेक्ट्स कम करने, खान-पान सुधारने और दर्द को संभालने में सपोर्टिव तौर पर मददगार हो सकता है, लेकिन कैंसर के मुख्य इलाज के तौर पर इसका कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

3. क्या फेनबेंडाज़ोल या आइवरमेक्टिन जैसी दवाइयां कैंसर ठीक कर सकती हैं?
नहीं। बड़ी मेडिकल संस्थाओं ने साफ कहा है कि इन दवाइयों का इंसानों पर कैंसर के इलाज के लिए कोई प्रमाणित परीक्षण नहीं हुआ है। लैब की पेट्री डिश में दिखा असर इंसानी शरीर पर लागू नहीं होता।

4. क्या डॉक्टर दवा कंपनियों के फायदे के लिए कीमो लिखते हैं?
नहीं। डॉक्टर मान्य मेडिकल गाइडलाइंस के हिसाब से इलाज करते हैं, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। सरकारी अस्पतालों में भी वही प्रोटोकॉल इस्तेमाल होता है, जहां दवा कंपनियों का कोई प्रभाव नहीं होता।

5. अगर कीमो का सुझाव मिले तो पहला कदम क्या होना चाहिए?
बायोप्सी और मॉलिक्यूलर टेस्ट ज़रूर करवाएं, मान्य गाइडलाइंस के हिसाब से इलाज लें, और अगर दूसरी राय चाहिए तो किसी योग्य ऑन्कोलॉजिस्ट से ही लें, किसी सोशल मीडिया मैसेज या व्हाट्सएप ग्रुप से नहीं।

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